सीनियर एडवोकेट बनने के लिए 12 लाख रुपये वार्षिक आय की अनिवार्यता पर हाईकोर्ट का नोटिस

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विवेक झा, जबलपुर/भोपाल। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सीनियर एडवोकेट के पदनाम (Designation) के लिए निर्धारित न्यूनतम 12 लाख रुपये वार्षिक आय की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए रजिस्ट्रार जनरल और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद दोनों पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

यह मामला अधिवक्ताओं के बीच लंबे समय से चर्चा का विषय बने नए ‘द हाई कोर्ट ऑफ मध्य प्रदेश (डेजिग्नेशन ऑफ सीनियर एडवोकेट्स) रूल्स, 2025’ से जुड़ा है, जिसमें पहली बार वरिष्ठ अधिवक्ता के पदनाम के लिए आय संबंधी पात्रता का प्रावधान जोड़ा गया है।

भोपाल के अधिवक्ता ने दी नियम को चुनौती

यह याचिका डब्ल्यू.पी. क्रमांक 28492/2026 भोपाल निवासी अधिवक्ता राजेश नेमा ने संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत दायर की है। विभिन्न उच्च न्यायालयों में प्रैक्टिस कर रहे अधिवक्ता राजेश नेमा ने न्यायालय में स्वयं उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा।

याचिका में ‘द हाई कोर्ट ऑफ मध्य प्रदेश (डेजिग्नेशन ऑफ सीनियर एडवोकेट्स) रूल्स, 2025’ के नियम-07 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

क्या है विवादित नियम?

विवादित नियम के अनुसार सीनियर एडवोकेट पदनाम के लिए आवेदन करने वाले अधिवक्ता का—

  • कम से कम 10 वर्षों से आयकरदाता होना आवश्यक है।
  • पिछले तीन वित्तीय वर्षों की आयकर विवरणी (ITR) प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
  • वकालत के पेशे से न्यूनतम 12 लाख रुपये वार्षिक शुद्ध आय होना आवश्यक है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यह आर्थिक शर्त कई योग्य अधिवक्ताओं को केवल आय के आधार पर पात्रता से बाहर कर देती है।

‘योग्यता का पैमाना आय नहीं, विधिक क्षमता हो’

याचिका में कहा गया है कि वरिष्ठ अधिवक्ता का पद किसी वकील की विधिक दक्षता, न्यायिक ज्ञान, ईमानदारी, अनुभव, बार में प्रतिष्ठा और न्याय व्यवस्था के प्रति योगदान के आधार पर दिया जाना चाहिए, न कि उसकी आय के आधार पर।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अनेक ऐसे अधिवक्ता हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा, निष्ठा और कानूनी ज्ञान के दम पर विशिष्ट पहचान बनाई है, लेकिन उनकी आय निर्धारित सीमा से कम होने के कारण वे आवेदन तक नहीं कर पाएंगे।

अनुच्छेद-14 के उल्लंघन का तर्क

याचिका में कहा गया है कि नियम-07 भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ता के अनुसार यह नियम मनमाना, अव्यावहारिक और भेदभावपूर्ण है तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के भी विपरीत है।

याचिका में यह भी कहा गया कि वरिष्ठ अधिवक्ता की पात्रता तय करने के लिए आर्थिक स्थिति को आधार बनाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

पड़ोसी राज्यों का भी दिया हवाला

सुनवाई के दौरान यह भी तर्क रखा गया कि मध्यप्रदेश से लगे कई राज्यों के उच्च न्यायालयों में वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम के लिए न्यूनतम आय की कोई अनिवार्य शर्त नहीं है।

याचिकाकर्ता ने न्यायालय का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि जिन राज्यों की प्रति व्यक्ति आय मध्यप्रदेश से अधिक है, वहां भी इस प्रकार का आर्थिक मानदंड लागू नहीं किया गया है। ऐसे में मध्यप्रदेश में इसे लागू करना तर्कसंगत नहीं माना जा सकता।

रजिस्ट्रार जनरल और सरकार को नोटिस

मामले की सुनवाई के दौरान रजिस्ट्रार जनरल की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ सेठ तथा राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता डॉ. एस.एस. चौहान ने अग्रिम सूचना पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

खंडपीठ ने दोनों पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई निर्धारित कर दी है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक नियम की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न भी उठाता है कि वरिष्ठ अधिवक्ता जैसे प्रतिष्ठित पदनाम के लिए आर्थिक मानदंड को पात्रता का आधार बनाया जाना चाहिए या नहीं।

यदि न्यायालय इस नियम पर कोई महत्वपूर्ण टिप्पणी या निर्णय देता है, तो उसका प्रभाव भविष्य में मध्यप्रदेश में वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम की प्रक्रिया के साथ-साथ अन्य उच्च न्यायालयों की नीतियों पर भी पड़ सकता है।

मुख्य बातें

  • सीनियर एडवोकेट बनने के लिए 12 लाख रुपये वार्षिक आय की अनिवार्यता को चुनौती।
  • मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।
  • चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश।
  • याचिका में नियम-07 को अनुच्छेद-14 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया गया।
  • याचिकाकर्ता का तर्क— सीनियर एडवोकेट की पहचान आय नहीं, विधिक योग्यता, अनुभव और प्रतिष्ठा से होनी चाहिए।
  • पड़ोसी राज्यों के नियमों का हवाला देते हुए आर्थिक शर्त हटाने की मांग।

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